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mahabharat 12.263.7: जाजले! श्रुतियों और स्मृतियों में कहा गया है कि किसी विशेष कार्य के लिए यह दक्षिणा देनी चाहिए, वह दक्षिणा देनी चाहिए, उसके अनुसार यह यज्ञ उस दक्षिणा देने से श्रेष्ठ माना गया है; अन्यथा यदि यज्ञ करने वाला व्यक्ति शक्ति रहते हुए भी लोभ करता है, तो उसे चोरी का पाप लगता है और उसके कर्म भी उलट जाते हैं। 7॥   |   mahabharat अध्याय 12.263: जाजलिको तुलाधारका आत्मयज्ञविषयक धर्मका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 263: जाजलिको तुलाधारका आत्मयज्ञविषयक धर्मका उपदेश  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.263.7 
इदं देयमिदं देयमिति चायं प्रशस्यते।
अत: स्तैन्यं प्रभवति विकर्माणि च जाजले॥ ७॥
 
 
अनुवाद
जाजले! श्रुतियों और स्मृतियों में कहा गया है कि किसी विशेष कार्य के लिए यह दक्षिणा देनी चाहिए, वह दक्षिणा देनी चाहिए, उसके अनुसार यह यज्ञ उस दक्षिणा देने से श्रेष्ठ माना गया है; अन्यथा यदि यज्ञ करने वाला व्यक्ति शक्ति रहते हुए भी लोभ करता है, तो उसे चोरी का पाप लगता है और उसके कर्म भी उलट जाते हैं। 7॥
 
Jaazle! It is said in the Shrutis and Smritis that this Dakshina should be given for a particular work, that Dakshina should be given, according to that this Yagya is considered better than giving that Dakshina; Otherwise, if the person performing the yagya shows greed while still having power, then he commits the sin of stealing and his actions also get reversed. 7॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)