यस्मिन्नेवात्मतीर्थे न पशव: प्राप्नुयुर्मखम्।
अथ स्म कर्मणा केन वाणिज प्राप्नुयात् सुखम्॥ ३८॥
शंस मे तन्महाप्राज्ञ भृशं वै श्रद्दधामि ते।
अनुवाद
वणिक-पुत्र! यदि इस प्रकार पशु अर्थात् अज्ञानी मनुष्य आत्म-त्याग का सौभाग्य प्राप्त नहीं कर सकते, तो फिर किस कर्म से उन्हें सुख प्राप्त हो सकता है? महामते! यह बात मुझे बताइए। मुझे आपके वचनों पर अधिक विश्वास है। 38 1/2॥
Merchant-son! If in this way animals i.e. ignorant humans cannot attain the good fortune of self-sacrifice, then by what action can they attain happiness? Mahamate! Tell me this thing. I have more faith in your words. 38 1/2॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥