श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 263: जाजलिको तुलाधारका आत्मयज्ञविषयक धर्मका उपदेश  »  श्लोक 22-23h
 
 
श्लोक  12.263.22-23h 
धर्माधारा धर्मसुखा: कृत्स्नव्यवसितास्तथा॥ २२॥
अस्ति नस्तत्त्वतो भूय इति प्राज्ञस्त्ववेक्षते।
 
 
अनुवाद
हममें से बहुत से लोग ऐसे हैं जिनका एकमात्र आधार धर्म है, जो धर्म में सुख पाते हैं और जिन्होंने सब कर्तव्य-अकर्तव्य निश्चित कर लिए हैं; परन्तु बुद्धिमान् पुरुष यह देखता है कि ईश्वर हमारे वास्तविक स्वरूप से कहीं अधिक महान् और सर्वव्यापी है तथा विश्वात्मा के रूप में सर्वत्र विद्यमान है।
 
There are many among us who have religion as their only support, who find happiness in religion and who have decided all the duties and non-duties; but the wise man sees that God is much greater and all-encompassing than our true form and is present everywhere in the form of the universal soul.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)