Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7
mahabharat 12.263.15-16h: हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! जो मनुष्य अपने अप्रमाणिक तर्कों से प्रामाणिक वेदों को भी अप्रमाणिक सिद्ध करता है, उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं होती, उसका मन यहाँ सदा पापों में लगा रहता है और अपने अशुभ कर्मों के कारण वह पापियों के ही लोकों (नरक) में जाता है। ॥15 1/2॥   |   mahabharat अध्याय 12.263: जाजलिको तुलाधारका आत्मयज्ञविषयक धर्मका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 263: जाजलिको तुलाधारका आत्मयज्ञविषयक धर्मका उपदेश  »  श्लोक 15-16h
 
 
श्लोक  12.263.15-16h 
स स्म पापकृतां लोकान् गच्छेदशुभकर्मणा।
प्रमाणमप्रमाणेन य: कुर्यादशुभं नर:॥ १५॥
पापात्मा सोऽकृतप्रज्ञ: सदैवेह द्विजोत्तम।
 
 
अनुवाद
हे ब्राह्मणश्रेष्ठ! जो मनुष्य अपने अप्रमाणिक तर्कों से प्रामाणिक वेदों को भी अप्रमाणिक सिद्ध करता है, उसकी बुद्धि शुद्ध नहीं होती, उसका मन यहाँ सदा पापों में लगा रहता है और अपने अशुभ कर्मों के कारण वह पापियों के ही लोकों (नरक) में जाता है। ॥15 1/2॥
 
O best of Brahmins! The person who proves the authentic Vedas to be inauthentic by his unauthentic arguments, his intellect is not pure, his mind is always engaged in sins here and due to his inauspicious deeds, he goes to the worlds (hell) of sinners only. ॥15 1/2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)