श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 260: युधिष्ठिरका धर्मकी प्रामाणिकतापर संदेह उपस्थित करना  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  12.260.20 
चिराभिपन्न: कविभि: पूर्वं धर्म उदाहृत:।
तेनाचारेण पूर्वेण संस्था भवति शाश्वती॥ २०॥
 
 
अनुवाद
आपने सर्वप्रथम उसी धर्म का वर्णन किया है जिसका पालन विद्वान लोग युगों-युगों से करते आ रहे हैं। मेरा भी यही मानना ​​है कि पूर्व प्रचलित उस धर्म का आचरण करने से ही समाज की गरिमा दीर्घकाल तक अक्षुण्ण रहती है।
 
You have first described the same religion which learned people have been following since ages. I also believe that the dignity of society remains intact for a long time only by practising that previously prevalent religion.
 
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि धर्मप्रामाण्याक्षेपे षष्टॺधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २६०॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें धर्मकी प्रामाणिकतापर आक्षेपविषयक दो सौ साठवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २६०॥

 
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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