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श्लोक 12.260.19  |
येनैवान्य: प्रभवति सोऽपरानपि बाधते।
आचाराणामनैकाग्रॺं सर्वेषामुपलक्षयेत्॥ १९॥ |
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| अनुवाद |
| जिस धर्म से एक व्यक्ति उन्नति करता है, उसी धर्म से दूसरा व्यक्ति दूसरों को दुःख पहुँचाता है; इसलिए कोई भी सबके प्रति एकरूप आचरण नहीं कर सकता॥19॥ |
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| The same religion by which one person prospers, another person causes pain to others; hence no one can show uniformity of conduct for everyone.॥ 19॥ |
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