श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 260: युधिष्ठिरका धर्मकी प्रामाणिकतापर संदेह उपस्थित करना  »  श्लोक 18
 
 
श्लोक  12.260.18 
तेनैवान्य: प्रभवति सोऽपरं बाधते पुन:।
दृश्यते चैव स पुनस्तुल्यरूपो यदृच्छया॥ १८॥
 
 
अनुवाद
यह भी देखा जाता है कि विश्वामित्र आदि अन्य महापुरुषों ने भी उसी धर्म का आचरण करके उन्नति प्राप्त की है और रावण आदि राक्षस उसी धर्म के बल से दूसरों को सताते हैं तथा कश्यप आदि अनेक महान ऋषिगण उसी धर्म के द्वारा भगवान की इच्छा से सदैव उसी अवस्था में देखे जाते हैं ॥18॥
 
It is also seen that other great men like Vishwamitra have attained progress by practising the same religion and the demons like Ravana torment others by the power of the same religion and many great sages like Kashyap etc. are always seen in the same state by the will of God through the same religion. ॥ 18॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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