श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 260: युधिष्ठिरका धर्मकी प्रामाणिकतापर संदेह उपस्थित करना  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  12.260.17 
महाजना ह्युपावृत्ता राजधर्मं समाश्रिता:।
न हि सर्वहित: कश्चिदाचार: सम्प्रवर्तते॥ १७॥
 
 
अनुवाद
आचार्य द्रोण जैसे महापुरुष भी अपने धर्म से विमुख होकर क्षत्रिय धर्म को अपनाते हैं; इसलिए ऐसा कोई आचरण नहीं है जो सबके लिए समान रूप से हितकारी हो अथवा जिसका पालन सभी समान रूप से कर सकें॥ 17॥
 
Even great men like Acharya Drona, turning away from their own religion, adopt the dharma of a kshatriya; hence there is no such conduct which is equally beneficial for all or can be followed equally by all.॥ 17॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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