श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 260: युधिष्ठिरका धर्मकी प्रामाणिकतापर संदेह उपस्थित करना  »  श्लोक 14
 
 
श्लोक  12.260.14 
निपानानीव गोभ्योऽपि क्षेत्रे कुल्ये च भारत।
स्मृतिर्हि शाश्वतो धर्मो विप्रहीणो न दृश्यते॥ १४॥
 
 
अनुवाद
हे भरतनन्दन! जैसे बहुत सी गायों को पानी पिलाने से छोटे-छोटे जलाशय सूख जाते हैं और बहुत से खेतों को सींचने से नहरें सूख जाती हैं, वैसे ही कलियुग के अन्त में सनातन वैदिक धर्म या स्मृतिशास्त्र भी धीरे-धीरे लुप्त हो जाता है और दिखाई भी नहीं देता॥ 14॥
 
O Bharatanandan! Just as small reservoirs get dried up by watering many cows and just as canals get drained by irrigating many fields, similarly the Sanatan Vedic Dharma or Smriti Shastra gradually fades away and is not even visible in the last part of Kaliyug.॥ 14॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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