श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 260: युधिष्ठिरका धर्मकी प्रामाणिकतापर संदेह उपस्थित करना  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  12.260.10 
ते चेत् सर्वप्रमाणं वै प्रमाणं ह्यत्र विद्यते।
प्रमाणेऽप्यप्रमाणेन विरुद्धे शास्त्रता कुत:॥ १०॥
 
 
अनुवाद
यदि सभी वेद प्रामाणिक हैं तो स्मृतियाँ भी प्रामाणिक हो सकती हैं; किन्तु जब प्रामाणिक वेद भी अप्रमाणिक हैं (विभिन्न युगों में धर्म के विषय में भिन्न-भिन्न बातें कहे जाने के कारण) तो वेदों का मूलरूपी स्मृतियाँ भी प्रामाणिक नहीं होंगी। यदि स्मृति श्रुति के प्रतिकूल है तो उसे शास्त्र का दर्जा कैसे प्राप्त हो सकता है?॥10॥
 
If all the Vedas are authentic then the Smritis can also be authentic; but when the authentic Vedas are also non-authentic (due to different things being said about religion in different eras) then the Smritis which are the origin of the Vedas will also not be authentic. If the Smriti is in conflict with the Shruti then how can it have the status of a scripture?॥10॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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