श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 260: युधिष्ठिरका धर्मकी प्रामाणिकतापर संदेह उपस्थित करना  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.260.1 
युधिष्ठिर उवाच
सूक्ष्मं साधु समादिष्टं भवता धर्मलक्षणम्।
प्रतिभा त्वस्ति मे काचित् तां ब्रूयामनुमानत:॥ १॥
 
 
अनुवाद
युधिष्ठिर बोले, "पितामह! आपने धर्म के सूक्ष्म एवं सुन्दर लक्षण का वर्णन किया है; परन्तु मुझे तो कुछ और ही अनुभव हो रहा है। अतः मैं अनुमान के आधार पर ही उसके विषय में कुछ कहूँगा ॥1॥
 
Yudhishthira said, "Grandfather! You have described the subtle and beautiful characteristics of Dharma; but I am feeling something else. Therefore, I will say something about it only on the basis of conjecture. ॥ 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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