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mahabharat 12.259.9: जो शुद्ध पुरुष है, जिसमें चोरी आदि पाप नहीं हैं, वह राजा के द्वार पर निर्भय होकर और बिना किसी संशय के जाता है, क्योंकि वह अपने अन्तःकरण में कोई पाप नहीं देखता।॥9॥   |   mahabharat अध्याय 12.259: धर्माधर्मके स्वरूपका निर्णय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 259: धर्माधर्मके स्वरूपका निर्णय  »  श्लोक 9
 
 
श्लोक  12.259.9 
अभीत: शुचिरभ्येति राजद्वारमशङ्कित:।
न हि दुश्चरितं किंचिदन्तरात्मनि पश्यति॥ ९॥
 
 
अनुवाद
जो शुद्ध पुरुष है, जिसमें चोरी आदि पाप नहीं हैं, वह राजा के द्वार पर निर्भय होकर और बिना किसी संशय के जाता है, क्योंकि वह अपने अन्तःकरण में कोई पाप नहीं देखता।॥9॥
 
A man who is pure, who has no sins like theft etc., goes to the king's doorstep fearlessly and without any doubts because he does not see any wrongdoing in his conscience.॥ 9॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)