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mahabharat 12.259.10: सत्य बोलना पुण्य कर्म है। सत्य से बढ़कर कोई कर्म नहीं है। सत्य ही सबका पालन करता है और सब कुछ सत्य पर आधारित है।॥10॥   |   mahabharat अध्याय 12.259: धर्माधर्मके स्वरूपका निर्णय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 259: धर्माधर्मके स्वरूपका निर्णय  »  श्लोक 10
 
 
श्लोक  12.259.10 
सत्यस्य वचनं साधु न सत्याद् विद्यते परम्।
सत्येन विधृतं सर्वं सर्वं सत्ये प्रतिष्ठितम्॥ १०॥
 
 
अनुवाद
सत्य बोलना पुण्य कर्म है। सत्य से बढ़कर कोई कर्म नहीं है। सत्य ही सबका पालन करता है और सब कुछ सत्य पर आधारित है।॥10॥
 
Speaking the truth is a good deed. There is no deed greater than truth. Truth sustains everyone and everything is based on truth.॥10॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)