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mahabharat 12.258.33: तब ब्रह्माजी ने उनसे कहा, 'हे मृत्यु! तुम मनुष्यों का वध करो, इससे तुम्हें कोई पाप नहीं लगेगा। शुभ! मैं तुम्हारा हित सोचता रहूँगा।॥ 33॥   |   mahabharat अध्याय 12.258: मृत्युकी घोर तपस्या और प्रजापतिकी आज्ञासे उसका प्राणियोंके संहारका कार्य स्वीकार करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 258: मृत्युकी घोर तपस्या और प्रजापतिकी आज्ञासे उसका प्राणियोंके संहारका कार्य स्वीकार करना  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  12.258.33 
तामब्रवीत् तदा देवी मृत्यो संहर मानवान्।
अधर्मस्ते न भविता तथा ध्यास्याम्यहं शुभे॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
तब ब्रह्माजी ने उनसे कहा, 'हे मृत्यु! तुम मनुष्यों का वध करो, इससे तुम्हें कोई पाप नहीं लगेगा। शुभ! मैं तुम्हारा हित सोचता रहूँगा।॥ 33॥
 
Then Brahma said to him, 'O Mrityu! You kill the humans, you will not incur any sin. Shubh! I will keep thinking good for you.॥ 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)