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mahabharat 12.258.3: हे प्रभु! मैं अधर्म से बहुत डरती हूँ। कृपया मुझे धर्मानुसार आचरण करने की शक्ति प्रदान करें। मुझ असहाय, भयभीत स्त्री की ओर कृपापूर्वक दृष्टि डालें और कृपा दृष्टि से देखें॥3॥   |   mahabharat अध्याय 12.258: मृत्युकी घोर तपस्या और प्रजापतिकी आज्ञासे उसका प्राणियोंके संहारका कार्य स्वीकार करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 258: मृत्युकी घोर तपस्या और प्रजापतिकी आज्ञासे उसका प्राणियोंके संहारका कार्य स्वीकार करना  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  12.258.3 
बिभेम्यहमधर्मस्य धर्म्यमादिश कर्म मे।
त्वं मां भीतामवेक्षस्व शिवेनेक्षस्व चक्षुषा॥ ३॥
 
 
अनुवाद
हे प्रभु! मैं अधर्म से बहुत डरती हूँ। कृपया मुझे धर्मानुसार आचरण करने की शक्ति प्रदान करें। मुझ असहाय, भयभीत स्त्री की ओर कृपापूर्वक दृष्टि डालें और कृपा दृष्टि से देखें॥3॥
 
‘Lord! I am very afraid of unrighteousness. Please allow me to act in accordance with righteousness. Please look at me, a helpless woman who is afraid, and look at me with a benevolent gaze.॥ 3॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)