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mahabharat 12.258.23-24: राजेन्द्र! तत्पश्चात्, हिमालय की चोटी पर, जहाँ देवताओं ने पहले यज्ञ किया था, वह परम शुभ कन्या सौ वर्षों तक अपने अंगूठे के बल खड़ी रही। इस प्रकार प्रयत्न करके उसने पितामह ब्रह्मा को संतुष्ट किया।   |   mahabharat अध्याय 12.258: मृत्युकी घोर तपस्या और प्रजापतिकी आज्ञासे उसका प्राणियोंके संहारका कार्य स्वीकार करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 258: मृत्युकी घोर तपस्या और प्रजापतिकी आज्ञासे उसका प्राणियोंके संहारका कार्य स्वीकार करना  »  श्लोक 23-24
 
 
श्लोक  12.258.23-24 
ततो हिमवतो मूर्ध्नि यत्र देवा: समीजिरे॥ २३॥
तत्राङ्गुष्ठेन राजेन्द्र निखर्वमपरं तत:।
तस्थौ पितामहं चैव तोषयामास यत्नत:॥ २४॥
 
 
अनुवाद
राजेन्द्र! तत्पश्चात्, हिमालय की चोटी पर, जहाँ देवताओं ने पहले यज्ञ किया था, वह परम शुभ कन्या सौ वर्षों तक अपने अंगूठे के बल खड़ी रही। इस प्रकार प्रयत्न करके उसने पितामह ब्रह्मा को संतुष्ट किया।
 
Rajendra! Thereafter, at the peak of the Himalayas where the gods had earlier performed a yajna, that extremely auspicious girl stood on her thumb for a hundred years. By making such efforts, she satisfied the grandfather Brahma.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)