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mahabharat 12.258.12-13: उनके बार-बार अनुरोध करने पर वह अभिमानी स्त्री प्राणहीन होकर मौन हो गई। वह 'हाँ' या 'नहीं' कुछ भी न कह सकी। तत्पश्चात, देवों के देव, लोकनाथ ब्रह्माजी स्वयं हृदय में अत्यंत प्रसन्न हुए और मुस्कुराते हुए समस्त लोकों की ओर देखने लगे।   |   mahabharat अध्याय 12.258: मृत्युकी घोर तपस्या और प्रजापतिकी आज्ञासे उसका प्राणियोंके संहारका कार्य स्वीकार करना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 258: मृत्युकी घोर तपस्या और प्रजापतिकी आज्ञासे उसका प्राणियोंके संहारका कार्य स्वीकार करना  »  श्लोक 12-13
 
 
श्लोक  12.258.12-13 
पुन: पुनरथोक्ता सा गतसत्त्वेव भामिनी।
तूष्णीमासीत् ततो देवो देवानामीश्वरेश्वर:॥ १२॥
प्रससाद किल ब्रह्मा स्वयमेवात्मनाऽऽत्मनि।
स्मयमानश्च लोकेशो लोकान् सर्वानवैक्षत॥ १३॥
 
 
अनुवाद
उनके बार-बार अनुरोध करने पर वह अभिमानी स्त्री प्राणहीन होकर मौन हो गई। वह 'हाँ' या 'नहीं' कुछ भी न कह सकी। तत्पश्चात, देवों के देव, लोकनाथ ब्रह्माजी स्वयं हृदय में अत्यंत प्रसन्न हुए और मुस्कुराते हुए समस्त लोकों की ओर देखने लगे।
 
On his repeated requests, the proud lady became lifeless and remained silent. She could not say anything, 'yes' or 'no'. Thereafter, the God of gods and the God of gods, Loknath Brahmaji himself became very happy in his heart and started looking at all the worlds smilingly.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)