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श्लोक 12.255.13  |
तत् पुत्र चिन्ताकलिलं तदुक्त-
मनागतं वै तव सम्प्रतीह।
भूतार्थतत्त्वं तदवाप्य सर्वं
भूतप्रभावाद् भव शान्तबुद्धि:॥ १३॥ |
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| अनुवाद |
| वत्स युधिष्ठिर! जगत की उत्पत्ति के विषय में पहले जो कुछ अन्य वक्ताओं ने कहा है, वह सब वेदविरुद्ध और विचारों से दूषित है; अतः इस समय सनातन परमेश्वर का यथार्थ तत्व सुनकर उसी परमेश्वर के प्रभाव और प्रसाद से शान्त हो जाओ॥13॥ |
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| Vatsa Yudhishthir! Whatever other speakers have said earlier about the origin of the world, all that is against the Vedas and is contaminated with thoughts; Therefore, at this time, after listening to the true essence of the eternal God, become calm due to the influence and offerings of the same God. 13॥ |
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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने पञ्चपञ्चाशदधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २५५॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक दो सौ पचपनवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २५५॥
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