व्यास उवाच
गन्धान् रसान् नानुरुन्ध्यात् सुखं वा
नालंकारांश्चाप्नुयात् तस्य तस्य।
मानं च कीर्तिं च यशश्च नेच्छेत्
स वै प्रचार: पश्यतो ब्राह्मणस्य॥ १॥
अनुवाद
व्यासजी कहते हैं, "बेटा! साधक को सुगंध और स्वाद आदि विषयों का भोग नहीं करना चाहिए, विषयों के उपभोग से उत्पन्न होने वाले सुखों की ओर नहीं जाना चाहिए, सोने आदि के सुन्दर आभूषण नहीं पहनने चाहिए तथा सम्मान, प्रशंसा और यश की इच्छा नहीं करनी चाहिए। यही ज्ञानी ब्राह्मण का आचरण है॥1॥
Vyasa says, "Son! A seeker should not enjoy objects like fragrance and taste, should not go towards the pleasures arising from the consumption of objects, should not wear beautiful ornaments made of gold etc. and should not desire respect, praise and fame. This is the conduct of a knowledgeable Brahmin. ॥1॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥