Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.250.12-15: यह संसार एक भयंकर नदी है, जो सम्पूर्ण जगत् में प्रवाहित हो रही है। इसके उद्गम सब दिशाओं में बहते हैं। पाँचों इन्द्रियाँ इसके भीतर पाँच मगरमच्छों के समान हैं। मन के संकल्प ही इसके तट हैं। यह लोभ और मोह रूपी घास-फूस से आच्छादित है। काम और क्रोध इसमें साँपों के समान निवास करते हैं। सत्य इसका घाट है। असत्य इसका विक्षोभ है। क्रोध कीचड़ है। यह नदी अन्य नदियों से श्रेष्ठ है। यह अव्यक्त प्रकृति रूपी पर्वत से निकली है। इसके जल का वेग बड़ा भयंकर है। अजेय आत्मा पुरुषों के लिए इसे पार करना बड़ा कठिन है। यह सब ओर से काम रूपी मगरमच्छों से भरी हुई है। यह नदी संसार-सागर में विलीन हो गई है। कामना रूपी गड्ढों के कारण इसे पार करना अत्यंत कठिन है। हे प्रिये! यह हमारे ही कर्मों से निर्मित हुई है। जीभ भँवर है और इस नदी को पार करना कठिन है। तुम अपनी शुद्ध बुद्धि से इस नदी को पार करो॥12-15॥ | mahabharat अध्याय 12.250: परमात्माकी प्राप्तिका साधन, संसार-नदीका वर्णन और ज्ञानसे ब्रह्मकी प्राप्ति । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
यह संसार एक भयंकर नदी है, जो सम्पूर्ण जगत् में प्रवाहित हो रही है। इसके उद्गम सब दिशाओं में बहते हैं। पाँचों इन्द्रियाँ इसके भीतर पाँच मगरमच्छों के समान हैं। मन के संकल्प ही इसके तट हैं। यह लोभ और मोह रूपी घास-फूस से आच्छादित है। काम और क्रोध इसमें साँपों के समान निवास करते हैं। सत्य इसका घाट है। असत्य इसका विक्षोभ है। क्रोध कीचड़ है। यह नदी अन्य नदियों से श्रेष्ठ है। यह अव्यक्त प्रकृति रूपी पर्वत से निकली है। इसके जल का वेग बड़ा भयंकर है। अजेय आत्मा पुरुषों के लिए इसे पार करना बड़ा कठिन है। यह सब ओर से काम रूपी मगरमच्छों से भरी हुई है। यह नदी संसार-सागर में विलीन हो गई है। कामना रूपी गड्ढों के कारण इसे पार करना अत्यंत कठिन है। हे प्रिये! यह हमारे ही कर्मों से निर्मित हुई है। जीभ भँवर है और इस नदी को पार करना कठिन है। तुम अपनी शुद्ध बुद्धि से इस नदी को पार करो॥12-15॥
This world is a terrible river, which is flowing in the whole world. Its sources flow in all directions. The five senses are like five crocodiles inside it. The resolutions of the mind are its banks. It is covered with grass and weeds of greed and attachment. Lust and anger reside in it like snakes. Truth is its ghat. Falsehood is its disturbance. Anger is the mud. This river is superior to other rivers. It has emerged from the mountain of unmanifested nature. The speed of its water is very fierce. It is very difficult for the unconquered soul men to cross it. It is filled with crocodiles of lust on all sides. This river has merged into the world-ocean. It is extremely difficult to cross it due to the deep pits of desire. O dear! It has been created by our own actions. The tongue is a whirlpool and it is difficult to cross this river. You cross this river with your pure intellect.॥12-15॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥