| श्री महाभारत » पर्व 12: शान्ति पर्व » अध्याय 247: महाभूतादि तत्त्वोंका विवेचन » श्लोक 4 |
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| | | | श्लोक 12.247.4  | प्रसार्येह यथाङ्गानि कूर्म: संहरते पुन:।
तद्वन्महान्ति भूतानि यवीय:सु विकुर्वते॥ ४॥ | | | | | | अनुवाद | | जैसे यहाँ कछुआ अपने अंगों को सब ओर फैलाता है और फिर समेट लेता है, वैसे ही ये समस्त महाभूत छोटे-छोटे शरीरों में विकृत, उत्पन्न और विलीन होते रहते हैं ॥4॥ | | | | Just as a tortoise here stretches out its limbs in all directions and then retracts them, similarly all these great elements keep getting distorted, generated and dissolved in small bodies. ॥ 4॥ | | ✨ ai-generated | | |
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