श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 247: महाभूतादि तत्त्वोंका विवेचन  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.247.1 
शुक उवाच
अध्यात्मं विस्तरेणेह पुनरेव वदस्व मे।
यदध्यात्मं यथा वेद भगवनृषिसत्तम॥ १॥
 
 
अनुवाद
शुकदेवजी बोले- हे प्रभु! महामुनि! अब आप मुझे पुनः विस्तारपूर्वक अध्यात्मज्ञान समझाइए। अध्यात्म क्या है और मैं उसे कैसे जानूँगा?॥1॥
 
Shukdevji said- O Lord! Great sage! Now again please teach me spiritual knowledge in detail. What is spirituality and how will I know it?॥ 1॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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