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mahabharat 12.246.1: व्यासजी कहते हैं - बेटा! शरीर, इन्द्रियाँ और मन आदि जो प्रकृति के रूप हैं, वे क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के आधार पर स्थित हैं। जड़ होने के कारण ये क्षेत्रज्ञ को नहीं जानते; परन्तु क्षेत्रज्ञ उन सबको जानता है।   |   mahabharat अध्याय 12.246: परमात्माकी श्रेष्ठता, उसके दर्शनका उपाय तथा इस ज्ञानमय उपदेशके पात्रका निर्णय   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 246: परमात्माकी श्रेष्ठता, उसके दर्शनका उपाय तथा इस ज्ञानमय उपदेशके पात्रका निर्णय  »  श्लोक 1
 
 
श्लोक  12.246.1 
व्यास उवाच
प्रकृत्यास्तु विकारा ये क्षेत्रज्ञस्तैरधिष्ठित:।
न चैनं ते प्रजानन्ति स तु जानाति तानपि॥ १॥
 
 
अनुवाद
व्यासजी कहते हैं - बेटा! शरीर, इन्द्रियाँ और मन आदि जो प्रकृति के रूप हैं, वे क्षेत्रज्ञ (आत्मा) के आधार पर स्थित हैं। जड़ होने के कारण ये क्षेत्रज्ञ को नहीं जानते; परन्तु क्षेत्रज्ञ उन सबको जानता है।
 
Vyasji says - Son! The body, senses and mind etc. which are the transformations of nature, exist on the basis of the Kshetrajna (soul). Being inert, they do not know the Kshetrajna; but the Kshetrajna knows them all.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)