श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 243: ब्राह्मणोंके उपलक्षणसे गार्हस्थ्य-धर्मका वर्णन  »  श्लोक 25
 
 
श्लोक  12.243.25 
पूर्वान् दश दश परान् पुनाति च पितामहान्।
गृहस्थवृत्तीश्चाप्येता वर्तयेद् यो गतव्यथ:॥ २५॥
 
 
अनुवाद
जो मनुष्य मन में किंचितमात्र भी वेदना अनुभव किए बिना इन गृहस्थ कर्तव्यों के सहारे जीवन व्यतीत करता है, वह अपने दस पीढ़ी तक के पूर्वजों को तथा आगे की दस पीढ़ी तक की अपनी सन्तानों को पवित्र कर देता है ॥ 25॥
 
He who lives his life with the help of these duties of a householder without experiencing even the slightest anguish in his mind, purifies his ancestors of ten generations and his children up to ten generations ahead. ॥ 25॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)