श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 241: कर्म और ज्ञानका अन्तर तथा ब्रह्मप्राप्तिके उपायका वर्णन  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  12.241.3 
भीष्म उवाच
इत्युक्त: प्रत्युवाचेदं पराशरसुत: सुतम्।
कर्मविद्यामयावेतौ व्याख्यास्यामि क्षराक्षरौ॥ ३॥
 
 
अनुवाद
भीष्म कहते हैं - राजन! शुकदेव के इस प्रकार पूछने पर पराशरपुत्र भगवान व्यास ने कहा - 'पुत्र! ये कर्म और ज्ञान मार्ग क्रमशः नाशवान और अविनाशी हैं। मैं इनका वर्णन आरम्भ करता हूँ।'
 
Bhishma says - King! On being asked in this manner by Shukdev, Lord Vyasa, son of Parashara, replied - 'Son! These paths of action and knowledge are respectively perishable and imperishable. I am beginning to explain them.
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas