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mahabharat 12.24.22: ‘प्रारम्भ किया हुआ कार्य भाग्य के प्रतिकूल प्रभाव से नष्ट हो जाता है और भाग्य के अनुकूल होने पर पूर्ण हो जाता है; तथापि यदि राजा अपनी ओर से आवश्यक प्रयत्न करता है (कार्य पूर्ण न होने पर भी) तो उसे पाप स्पर्श नहीं करता ॥ 22॥   |   mahabharat अध्याय 12.24: व्यासजीका युधिष्ठिरको राजा हयग्रीवका चरित्र सुनाकर उन्हें राजोचित कर्तव्यका पालन करनेके लिये जोर देना   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 24: व्यासजीका युधिष्ठिरको राजा हयग्रीवका चरित्र सुनाकर उन्हें राजोचित कर्तव्यका पालन करनेके लिये जोर देना  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  12.24.22 
विच्छिद्यन्ते समारब्धा: सिद्धॺन्ते चापि दैवत:।
कृते पुरुषकारे तु नैन: स्पृशति पार्थिवम्॥ २२॥
 
 
अनुवाद
‘प्रारम्भ किया हुआ कार्य भाग्य के प्रतिकूल प्रभाव से नष्ट हो जाता है और भाग्य के अनुकूल होने पर पूर्ण हो जाता है; तथापि यदि राजा अपनी ओर से आवश्यक प्रयत्न करता है (कार्य पूर्ण न होने पर भी) तो उसे पाप स्पर्श नहीं करता ॥ 22॥
 
‘The work once started gets destroyed by the adverse influence of destiny and gets accomplished when the destiny favours him; however, if the king makes the necessary efforts on his part (even if the task is not accomplished), he is not touched by sin. ॥ 22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)