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श्लोक 12.239.34  |
हंसोक्तं चाक्षरं चैव कूटस्थं यत् तदक्षरम्।
तद् विद्वानक्षरं प्राप्य जहाति प्राणजन्मनी॥ ३४॥ |
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| अनुवाद |
| हंस नाम से जो अमर आत्मा प्रतिपादित की गई है, वह कूटस्थ अक्षर ही है, इस प्रकार जो विद्वान् उस अक्षर आत्मा को वास्तव में जानता है, वह जीवन, जन्म और मृत्यु के बंधन को सदा के लिए त्याग देता है ॥34॥ |
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| The immortal soul which has been presented in the name of Hans is the Kutastha Akshar itself, thus the scholar who knows that Akshar Atman in reality, gives up the bondage of life, birth and death forever. 34॥ |
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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने एकोनचत्वारिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २३९॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक दो सौ उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २३९॥
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