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mahabharat 12.238.7: त्रेता, द्वापर और कलियुग के लोग परम सत्य के विषय में संशयी होते हैं; किन्तु सत्ययुग के लोग तपस्वी और सत्त्वगुणी होने के कारण शान्त (संशयरहित) होते हैं।   |   mahabharat अध्याय 12.238: नाना प्रकारके भूतोंकी समीक्षापूर्वक कर्मतत्त्वका विवेचन, युगधर्मका वर्णन एवं कालका महत्त्व   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 238: नाना प्रकारके भूतोंकी समीक्षापूर्वक कर्मतत्त्वका विवेचन, युगधर्मका वर्णन एवं कालका महत्त्व  »  श्लोक 7
 
 
श्लोक  12.238.7 
त्रेतायां द्वापरे चैव कलिजाश्च ससंशया:।
तपस्विन: प्रशान्ताश्च सत्त्वस्थाश्च कृते युगे॥ ७॥
 
 
अनुवाद
त्रेता, द्वापर और कलियुग के लोग परम सत्य के विषय में संशयी होते हैं; किन्तु सत्ययुग के लोग तपस्वी और सत्त्वगुणी होने के कारण शान्त (संशयरहित) होते हैं।
 
The people of Treta, Dwapara and Kali Yuga are doubtful about the ultimate truth; however, the people of Satya Yuga are peaceful (doubt-free) due to being ascetics and having Sattva Guna. 7.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)