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एतदेवं च नैवं च न चोभे नानुभे तथा।
कर्मस्था विषयं ब्रूयु: सत्त्वस्था: समदर्शिन:॥ ६॥
अनुवाद
कुछ कर्मनिष्ठ विचारक पात्र, वस्त्र आदि विषयों के सम्बन्ध में कहते हैं कि ‘यह ऐसा है।’ दूसरे कहते हैं कि ‘ऐसा नहीं है।’ तीसरे कहते हैं कि ‘ये दोनों ही सम्भव हैं अर्थात् यह ऐसा है और ऐसा नहीं है।’ अन्य लोग कहते हैं कि ‘ये दोनों ही मत सम्भव नहीं हैं।’ परन्तु सत्त्वगुण में स्थित योगी सर्वव्यापी ब्रह्म को ही कारण रूप में देखता है। ॥6॥
Some karma-devoted thinkers say in relation to the subjects like pot, cloth etc. that 'it is like this.' Others say that 'it is not like this.' Third ones say that 'both of these are possible i.e. it is like this and it is not like this.' Other people say that 'both of these views are not possible.' But the Yogi who is situated in the Sattva Guna sees the universal Brahma as the cause. ॥ 6॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥