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mahabharat 12.238.2: यदि कर्म में संशय न हो, तो वह सिद्धि देता है। यहाँ संशय यह है कि यह कर्म स्वाभाविक है या ज्ञानजन्य?॥2॥   |   mahabharat अध्याय 12.238: नाना प्रकारके भूतोंकी समीक्षापूर्वक कर्मतत्त्वका विवेचन, युगधर्मका वर्णन एवं कालका महत्त्व   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 238: नाना प्रकारके भूतोंकी समीक्षापूर्वक कर्मतत्त्वका विवेचन, युगधर्मका वर्णन एवं कालका महत्त्व  »  श्लोक 2
 
 
श्लोक  12.238.2 
तत्र चेन्न भवेदेवं संशय: कर्मसिद्धये।
किं तु कर्म स्वभावोऽयं ज्ञानं कर्मेति वा पुन:॥ २॥
 
 
अनुवाद
यदि कर्म में संशय न हो, तो वह सिद्धि देता है। यहाँ संशय यह है कि यह कर्म स्वाभाविक है या ज्ञानजन्य?॥2॥
 
If there is no doubt in action, then it gives success. Here the doubt is whether this action is natural or born of knowledge?॥ 2॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)