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mahabharat 12.238.14: सत्ययुग और त्रेता में वेद, यज्ञ और वर्णाश्रम धर्म का पालन अपने शुद्ध रूप में होता है, लेकिन द्वापरयुग में लोगों की आयु कम होने के कारण इनका भी ह्रास होने लगता है।   |   mahabharat अध्याय 12.238: नाना प्रकारके भूतोंकी समीक्षापूर्वक कर्मतत्त्वका विवेचन, युगधर्मका वर्णन एवं कालका महत्त्व   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
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श्लोक  12.238.14 
त्रेतादौ केवला वेदा यज्ञा वर्णाश्रमास्तथा।
संरोधादायुषस्त्वेते व्यस्यन्ते द्वापरे युगे॥ १४॥
 
 
अनुवाद
सत्ययुग और त्रेता में वेद, यज्ञ और वर्णाश्रम धर्म का पालन अपने शुद्ध रूप में होता है, लेकिन द्वापरयुग में लोगों की आयु कम होने के कारण इनका भी ह्रास होने लगता है।
 
In Satyayuga and Treta, Vedas, Yajnas and Varnashram Dharma are followed in their pure form, but in Dwaparyuga, due to the decrease in the lifespan of people, these also start to diminish.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)