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mahabharat 12.236.8: इस प्रकार जो मनुष्य जीवनपर्यन्त इस योग का अभ्यास करता है, यदि वह ब्रह्म के विषय में जिज्ञासु है, तो वह वेदों में वर्णित सकाम कर्मों की सीमा को लांघ जाता है। 8॥   |   mahabharat अध्याय 12.236: ध्यानके सहायक योग, उनके फल और सात प्रकारकी धारणाओंका वर्णन तथा सांख्य एवं योगके अनुसार ज्ञानद्वारा मोक्षकी प्राप्ति   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 236: ध्यानके सहायक योग, उनके फल और सात प्रकारकी धारणाओंका वर्णन तथा सांख्य एवं योगके अनुसार ज्ञानद्वारा मोक्षकी प्राप्ति  »  श्लोक 8
 
 
श्लोक  12.236.8 
एवं ह्येतेन योगेन युञ्जानो ह्येवमन्तत:।
अपि जिज्ञासमानोऽपि शब्दब्रह्मातिवर्तते॥ ८॥
 
 
अनुवाद
इस प्रकार जो मनुष्य जीवनपर्यन्त इस योग का अभ्यास करता है, यदि वह ब्रह्म के विषय में जिज्ञासु है, तो वह वेदों में वर्णित सकाम कर्मों की सीमा को लांघ जाता है। 8॥
 
In this way, if a person who practices this yoga till the end of his life is inquisitive about Brahma, then he crosses the limits of fruitive actions as mentioned in the Vedas. 8॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)