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श्लोक 12.236.41  |
इत्येषा भावजा बुद्धि: कथिता ते न संशय:।
एवं भवति निर्द्वन्द्वो ब्रह्माणं चाधिगच्छति॥ ४१॥ |
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| अनुवाद |
| पुत्र! मैंने तुम्हें भावों की शुद्धि से प्राप्त होने वाले ज्ञान का वर्णन किया है। जो उपर्युक्त विधि का अभ्यास करके द्वन्द्वों से मुक्त हो जाता है, वही ब्रह्मभाव को प्राप्त होता है, इसमें कोई संदेह नहीं है। ॥41॥ |
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| Son! I have described to you the wisdom that is obtained by purification of feelings. The one who becomes free from conflicts by practising the above mentioned method, he alone attains Brahmabhaav, there is no doubt in this. ॥ 41॥ |
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इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि शुकानुप्रश्ने षट्त्रिंशदधिकद्विशततमोऽध्याय:॥ २३६॥
इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें शुकदेवका अनुप्रश्नविषयक दो सौ छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ॥ २३६॥
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