श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 236: ध्यानके सहायक योग, उनके फल और सात प्रकारकी धारणाओंका वर्णन तथा सांख्य एवं योगके अनुसार ज्ञानद्वारा मोक्षकी प्राप्ति  »  श्लोक 34-36h
 
 
श्लोक  12.236.34-36h 
निर्ममश्चानहङ्कारो निर्द्वन्द्वश्छिन्नसंशय:।
नैव क्रुद्धॺति न द्वेष्टि नानृता भाषते गिर:॥ ३४॥
आक्रुष्टस्ताडितश्चैव मैत्रेण ध्याति नाशुभम्।
वाग्दण्डकर्ममनसां त्रयाणां च निवर्तक:॥ ३५॥
सम: सर्वेषु भूतेषु ब्रह्माणमभिवर्तते।
 
 
अनुवाद
जिसने आसक्ति और अहंकार का त्याग कर दिया है, जो शीत और उष्ण के द्वन्द्वों को समभाव से सहन करता है, जिसने समस्त संशय दूर कर दिए हैं, जो कभी क्रोध या द्वेष नहीं करता, जो झूठ नहीं बोलता, जो किसी के द्वारा गाली सुनने या मार खाने पर भी किसी का बुरा नहीं सोचता, जो सबके प्रति मैत्रीभाव रखता है, जो मन, वाणी और कर्म से किसी प्राणी को कष्ट नहीं पहुँचाता तथा जो सब प्राणियों के साथ समान व्यवहार करता है, वही योगी ब्रह्मभाव को प्राप्त होता है ॥34-35 1/2॥
 
He who has renounced attachment and ego, who endures the dualities of cold and heat with equanimity, who has dispelled all doubts, who never becomes angry or hates, who does not lie, who does not think ill of anyone even after hearing someone abuse him or getting beaten up, who has a friendly attitude towards all, who does not harm any living being by his mind, speech and action, and who treats all creatures equally, that Yogi alone attains Brahmabhaav. ॥34-35 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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