श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 236: ध्यानके सहायक योग, उनके फल और सात प्रकारकी धारणाओंका वर्णन तथा सांख्य एवं योगके अनुसार ज्ञानद्वारा मोक्षकी प्राप्ति  »  श्लोक 3-4h
 
 
श्लोक  12.236.3-4h 
छिन्नदोषो मुनिर्योगान् युक्तो युञ्जीत द्वादश।
देशकर्मानुरागार्थानुपायापायनिश्चयै: ॥ ३॥
चक्षुराहारसंहारैर्मनसा दर्शनेन च।
 
 
अनुवाद
एकाग्र मन वाले मुनि को चाहिए कि वह आसक्ति आदि हृदय के दोषों का नाश करे और योग में सहायक बारह योगों - स्थान, कर्म, प्रीति, धन, विधि, समस्या, निश्चय, नेत्र, आहार, नाश, मन और दृष्टि - का आश्रय ले तथा ध्यान-योग का अभ्यास करे।*॥3 1/2॥
 
A sage with a concentrated mind should destroy the defects of the heart like attachment etc. and should take recourse to the twelve yogas which help in yoga - place, action, love, wealth, method, problem, determination, eyes, food, destruction, mind and vision and should practice meditation-yoga.*॥ 3 1/2॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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