श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 236: ध्यानके सहायक योग, उनके फल और सात प्रकारकी धारणाओंका वर्णन तथा सांख्य एवं योगके अनुसार ज्ञानद्वारा मोक्षकी प्राप्ति  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  12.236.20 
तस्मिन्नुपरतेऽजोऽस्य पीतशस्त्र: प्रकाशते।
ऊर्णारूपसवर्णस्य तस्य रूपं प्रकाशते॥ २०॥
 
 
अनुवाद
जब वह भी सिद्ध हो जाता है, तब योगी आकाश में सर्वत्र फैली हुई वायु का अनुभव करता है। उस समय वृक्ष, पर्वत आदि अपने समस्त आयुधों को ग्रस लेने के कारण वायु 'पितृशस्त्र' कहलाती है, अर्थात् पृथ्वी, जल और तेज आदि समस्त पदार्थों को ग्रस लेने के पश्चात् वायु आकाश में ही विचरण करती रहती है और साधक स्वयं ऊन के सूत के समान अत्यन्त छोटा और हल्का होकर आधारहीन आकाश में वायु के साथ ही स्थित मानता है। 20॥
 
When that too is achieved, the yogi experiences the air spread everywhere in the sky. At that time, due to consuming all its weapons like trees, mountains etc., the wind becomes known as 'Pitashastra', that is, after swallowing all the substances like earth, water and light, the wind keeps moving only in the sky and the seeker himself, being very small and light like a thread of wool, considers himself situated along with the wind in the baseless sky. 20॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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