श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 236: ध्यानके सहायक योग, उनके फल और सात प्रकारकी धारणाओंका वर्णन तथा सांख्य एवं योगके अनुसार ज्ञानद्वारा मोक्षकी प्राप्ति  »  श्लोक 19
 
 
श्लोक  12.236.19 
जलरूपमिवाकाशे तथैवात्मनि पश्यति।
अपां व्यतिक्रमे चास्य वह्निरूपं प्रकाशते॥ १९॥
 
 
अनुवाद
वह सम्पूर्ण आकाश को जलरूप देखता है और आत्मा को भी जलरूप अनुभव करता है (यह अनुभव जलतत्त्व का ध्यान करते समय होता है) फिर जल के विलीन हो जाने पर अग्नितत्त्व का ध्यान करते हुए वह सर्वत्र अग्नि को चमकता हुआ देखता है॥19॥
 
He sees the entire sky as water and experiences the soul as water (this experience happens while meditating on the water element). Then, after the water dissolves, while meditating on the fire element, he sees fire shining everywhere.॥19॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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