श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 236: ध्यानके सहायक योग, उनके फल और सात प्रकारकी धारणाओंका वर्णन तथा सांख्य एवं योगके अनुसार ज्ञानद्वारा मोक्षकी प्राप्ति  »  श्लोक 17
 
 
श्लोक  12.236.17 
निर्मुच्यमान: सूक्ष्मत्वाद् रूपाणीमानि पश्यत:।
शैशिरस्तु यथा धूम: सूक्ष्म: संश्रयते नभ:॥ १७॥
 
 
अनुवाद
जब साधक स्थूल शरीर के अभिमान से मुक्त होकर ध्यान में स्थित होता है, तब सूक्ष्म दृष्टि से युक्त होने के कारण उसे कुछ इस प्रकार के रूप (चिह्न) दिखाई देते हैं। प्रारम्भ में पृथ्वी की कल्पना करते समय ऐसा प्रतीत होता है कि शीतकाल के कोहरे के समान कोई सूक्ष्म वस्तु सम्पूर्ण आकाश को आच्छादित कर रही है॥17॥
 
When a seeker is free from the pride of the physical body and is in meditation, then due to being endowed with subtle vision, he sees some such forms (signs). Initially while imagining the earth, it appears that some subtle object like the fog of winter is covering the entire sky.॥ 17॥
 ✨ ai-generated
 
 
  Connect Form
  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
  © 2026 vedamrit.in All Rights Reserved. Developed by AmritChaitanyaDas