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mahabharat 12.234.13: गृहस्थ ब्राह्मण को देवताओं, ऋषियों, पितरों, गुरुजनों, वृद्धों, रोगियों तथा भूखे लोगों को भोजन कराने के लिए प्रतिग्रह को स्वीकार करना चाहिए। प्रतिग्रह के अतिरिक्त ब्राह्मण के लिए धन संचय का कोई अन्य पवित्र मार्ग नहीं है। 13॥   |   mahabharat अध्याय 12.234: ब्राह्मणोंका कर्तव्य और उन्हें दान देनेकी महिमाका वर्णन   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 234: ब्राह्मणोंका कर्तव्य और उन्हें दान देनेकी महिमाका वर्णन  »  श्लोक 13
 
 
श्लोक  12.234.13 
गृहमावसतो ह्यस्य नान्यत् तीर्थं प्रतिग्रहात् ।
देवर्षिपितृगुर्वर्थं वृद्धातुरबुभुक्षताम्॥ १३॥
 
 
अनुवाद
गृहस्थ ब्राह्मण को देवताओं, ऋषियों, पितरों, गुरुजनों, वृद्धों, रोगियों तथा भूखे लोगों को भोजन कराने के लिए प्रतिग्रह को स्वीकार करना चाहिए। प्रतिग्रह के अतिरिक्त ब्राह्मण के लिए धन संचय का कोई अन्य पवित्र मार्ग नहीं है। 13॥
 
A householder Brahmin should accept Pratigraha to provide food to gods, sages, ancestors, gurus, old people, sick people and hungry people. Apart from Pratigraha, there is no other sacred way for a Brahmin to accumulate wealth. 13॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)