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mahabharat 12.232.35: त्रेतायुग में वेद, यज्ञ और वर्णाश्रम-धर्म का विधिपूर्वक पालन किया जाता था; किन्तु द्वापरयुग में आयु कम होने के कारण इनके पालन में लोगों का उत्साह कम हो गया - वे वेद यज्ञ आदि का परित्याग करने लगे ॥35॥   |   mahabharat अध्याय 12.232: व्यासजीका शुकदेवको सृष्टिके उत्पत्ति-क्रम तथा युगधर्मोंका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 232: व्यासजीका शुकदेवको सृष्टिके उत्पत्ति-क्रम तथा युगधर्मोंका उपदेश  »  श्लोक 35
 
 
श्लोक  12.232.35 
त्रेतायां संहता वेदा यज्ञा वर्णाश्रमास्तथा।
संरोधादायुषस्त्वेते भ्रश्यन्ते द्वापरे युगे॥ ३५॥
 
 
अनुवाद
त्रेतायुग में वेद, यज्ञ और वर्णाश्रम-धर्म का विधिपूर्वक पालन किया जाता था; किन्तु द्वापरयुग में आयु कम होने के कारण इनके पालन में लोगों का उत्साह कम हो गया - वे वेद यज्ञ आदि का परित्याग करने लगे ॥35॥
 
In Treta Yuga, Vedas, Yagya and Varnashrama-dharma were followed systematically; But in the Dwaparayuga, due to reduction in age, people's enthusiasm for following them diminished - they started abandoning Veda Yagya etc. 35॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)