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mahabharat 12.232.33: सत्ययुग में अद्वैत धर्म में श्रद्धा रखने वाले मनुष्य ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और सकाम इष्टियों को ज्ञानरूप तप से भिन्न देखकर उन सबको छोड़कर केवल ज्ञानरूप तप में ही लग जाते हैं॥33॥   |   mahabharat अध्याय 12.232: व्यासजीका शुकदेवको सृष्टिके उत्पत्ति-क्रम तथा युगधर्मोंका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 232: व्यासजीका शुकदेवको सृष्टिके उत्पत्ति-क्रम तथा युगधर्मोंका उपदेश  »  श्लोक 33
 
 
श्लोक  12.232.33 
अपृथग्धर्मिणो मर्त्या ऋक्सामानि यजूंषि च।
काम्या इष्टी: पृथग् दृष्ट्वा तपोभिस्तप एव च॥ ३३॥
 
 
अनुवाद
सत्ययुग में अद्वैत धर्म में श्रद्धा रखने वाले मनुष्य ऋग्वेद, सामवेद, यजुर्वेद और सकाम इष्टियों को ज्ञानरूप तप से भिन्न देखकर उन सबको छोड़कर केवल ज्ञानरूप तप में ही लग जाते हैं॥33॥
 
In Satyayuga, people who have faith in Advaita Dharma, seeing Rigveda, Samaveda, Yajurveda and Sakam Ishtis as different from penance in the form of knowledge, leave them all and engage only in penance in the form of knowledge. 33॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)