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mahabharat 12.232.3: वह मन दूरगामी यात्रा करता है और अनेक प्रकार से गति करता है। प्रार्थना और संशय से परिपूर्ण वह मन, चेतना के साथ मिलकर, सभी वस्तुओं पर विजय प्राप्त करता है और सात मानस ऋषियों का निर्माण करता है।   |   mahabharat अध्याय 12.232: व्यासजीका शुकदेवको सृष्टिके उत्पत्ति-क्रम तथा युगधर्मोंका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 232: व्यासजीका शुकदेवको सृष्टिके उत्पत्ति-क्रम तथा युगधर्मोंका उपदेश  »  श्लोक 3
 
 
श्लोक  12.232.3 
अभिभूयेह चार्चिष्मद् व्यसृजत् सप्त मानसान्।
दूरगं बहुधागामि प्रार्थनासंशयात्मकम्॥ ३॥
 
 
अनुवाद
वह मन दूरगामी यात्रा करता है और अनेक प्रकार से गति करता है। प्रार्थना और संशय से परिपूर्ण वह मन, चेतना के साथ मिलकर, सभी वस्तुओं पर विजय प्राप्त करता है और सात मानस ऋषियों का निर्माण करता है।
 
That mind has far reaching travel and moves in many ways. That mind full of prayer and doubt, combined with consciousness, overwhelms all objects and creates seven Manas Rishis.
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)