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mahabharat 12.232.22: तप ही जीवों के कल्याण का प्रधान साधन है। तप का मूल है संयम और आत्म-नियंत्रण। मनुष्य अपने मन में जो भी कामनाएँ प्राप्त करना चाहता है, वह उन सभी को तप के द्वारा प्राप्त कर लेता है ॥22॥   |   mahabharat अध्याय 12.232: व्यासजीका शुकदेवको सृष्टिके उत्पत्ति-क्रम तथा युगधर्मोंका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 232: व्यासजीका शुकदेवको सृष्टिके उत्पत्ति-क्रम तथा युगधर्मोंका उपदेश  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  12.232.22 
तपो नि:श्रेयसं जन्तोस्तस्य मूलं शमो दम:।
तेन सर्वानवाप्नोति यान् कामान् मनसेच्छति॥ २२॥
 
 
अनुवाद
तप ही जीवों के कल्याण का प्रधान साधन है। तप का मूल है संयम और आत्म-नियंत्रण। मनुष्य अपने मन में जो भी कामनाएँ प्राप्त करना चाहता है, वह उन सभी को तप के द्वारा प्राप्त कर लेता है ॥22॥
 
Penance is the main means of welfare of the living beings. The root of penance is self-control and self-control. Whatever desires a man wants to achieve in his mind, he achieves them all through penance. ॥22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)