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mahabharat 12.232.20: कुछ विद्वान कहते हैं कि फल की प्राप्ति पुरुषार्थ, प्रारब्ध और स्वभाव से किए गए कर्म के सहयोग से होती है। ये तीनों मिलकर ही कार्य की सिद्धि हैं। इनका पृथक होना कार्य की सफलता का कारण नहीं है।॥20॥   |   mahabharat अध्याय 12.232: व्यासजीका शुकदेवको सृष्टिके उत्पत्ति-क्रम तथा युगधर्मोंका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 232: व्यासजीका शुकदेवको सृष्टिके उत्पत्ति-क्रम तथा युगधर्मोंका उपदेश  »  श्लोक 20
 
 
श्लोक  12.232.20 
पौरुषं कर्म दैवं च फलवृत्ति: स्वभावत:।
त्रय एतेऽपृथग्भूता न विवेकं तु केचन॥ २०॥
 
 
अनुवाद
कुछ विद्वान कहते हैं कि फल की प्राप्ति पुरुषार्थ, प्रारब्ध और स्वभाव से किए गए कर्म के सहयोग से होती है। ये तीनों मिलकर ही कार्य की सिद्धि हैं। इनका पृथक होना कार्य की सफलता का कारण नहीं है।॥20॥
 
Some scholars say that the fruit is achieved with the cooperation of effort, destiny and work done by nature. These three together are the fulfilment of the task. Their separateness is not the reason for the success of the task.॥ 20॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)