श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 230: श्रीकृष्ण और उग्रसेनका संवाद—नारदजीकी लोकप्रियताके हेतुभूत गुणोंका वर्णन  »  श्लोक 16
 
 
श्लोक  12.230.16 
दृढभक्तिरनिन्द्यात्मा श्रुतवाननृशंसवान्।
वीतसम्मोहदोषश्च तस्मात् सर्वत्र पूजित:॥ १६॥
 
 
अनुवाद
वह मुझमें दृढ़ भक्ति रखता है। उसका हृदय शुद्ध है। वह विद्वान् और दयालु है। उसके आसक्ति आदि दोष दूर हो गए हैं, इसीलिए वह सर्वत्र आदर पाता है॥16॥
 
He has strong devotion towards me. His heart is pure. He is learned and kind. His defects like attachment etc. have been removed; that is why he is respected everywhere.॥ 16॥
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  हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥
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