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mahabharat 12.229.22: समस्त दोषों से रहित महात्मा अपमानित होने पर भी इस लोक और परलोक में निर्भय होकर शांतिपूर्वक सोता है; परंतु जो मनुष्य उसका अपमान करता है, वह पापों के बंधन में पड़ जाता है ॥22॥   |   mahabharat अध्याय 12.229: जैगीषव्यका असित-देवलको समत्वबुद्धिका उपदेश   ।   mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व   ।   श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
 
श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 229: जैगीषव्यका असित-देवलको समत्वबुद्धिका उपदेश  »  श्लोक 22
 
 
श्लोक  12.229.22 
अवज्ञात: सुखं शेते इह चामुत्र चाभयम्।
विमुक्त: सर्वदोषेभ्यो योऽवमन्ता स बध्यते॥ २२॥
 
 
अनुवाद
समस्त दोषों से रहित महात्मा अपमानित होने पर भी इस लोक और परलोक में निर्भय होकर शांतिपूर्वक सोता है; परंतु जो मनुष्य उसका अपमान करता है, वह पापों के बंधन में पड़ जाता है ॥22॥
 
A great soul, free from all defects, even if insulted, sleeps peacefully in this world and the next, without any fear; but a person who insults him falls into the bondage of sins. ॥22॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)