Deprecated: str_replace(): Passing null to parameter #3 ($subject) of type array|string is deprecated in /var/www/3ba56740-d0e5-465a-99e5-33425b2f2eb0/vedamrit.in/bookscommon/sloka.php on line 7 mahabharat 12.227.81-82h: इन्द्र! यही कारण है कि मैं चुपचाप तुम्हारे समस्त अपराधों को सहन कर रहा हूँ। अब भी मेरी गति तुम्हारे लिए अत्यन्त असहनीय है। किन्तु जब काल ने करवट ली है, काल की अग्नि ने मुझे चारों ओर से घेर लिया है और मैं निश्चय ही काल के पाश से बंध गया हूँ, तब तुम मेरे सामने खड़े होकर अपनी झूठी प्रशंसा कर रहे हो। | mahabharat अध्याय 12.227: इन्द्र और बलिका संवाद—काल और प्रारब्धकी महिमाका वर्णन । mahabharat पर्व 12: शान्ति पर्व । श्री महाभारत Sri Mahabharat | वेदामृत — Vedamrit | वैदिक ग्रंथों का संग्रह
इन्द्र! यही कारण है कि मैं चुपचाप तुम्हारे समस्त अपराधों को सहन कर रहा हूँ। अब भी मेरी गति तुम्हारे लिए अत्यन्त असहनीय है। किन्तु जब काल ने करवट ली है, काल की अग्नि ने मुझे चारों ओर से घेर लिया है और मैं निश्चय ही काल के पाश से बंध गया हूँ, तब तुम मेरे सामने खड़े होकर अपनी झूठी प्रशंसा कर रहे हो।
Indra! This is the reason that I silently tolerate all your crimes. Even now my speed is very unbearable for you. But when the time has taken a turn, the fire of time has surrounded me from all sides and I am definitely bound by the noose of time, then you are standing in front of me and falsely praising yourself. 81 1/2.
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥