न मन्त्रबलवीर्येण प्रज्ञया पौरुषेण च।
न शीलेन न वृत्तेन तथा नैवार्थसम्पदा।
अलभ्यं लभते मर्त्यस्तत्र का परिदेवना॥ २०॥
अनुवाद
जो वस्तु प्राप्त होने वाली नहीं है, उसे कोई भी मनुष्य मंत्र, बल, पराक्रम, बुद्धि, पुरुषार्थ, चरित्र, सदाचार और धन से भी प्राप्त नहीं कर सकता; फिर उसके लिए शोक क्यों करे?॥ 20॥
A thing which is not going to be obtained, cannot be obtained by any man even with mantras, strength, valour, wisdom, effort, character, good behaviour and wealth; then why should one grieve for it?॥ 20॥
समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)
हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे हरे। हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे॥