श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 226: इन्द्र और नमुचिका संवाद  »  श्लोक 11
 
 
श्लोक  12.226.11 
यत्र यत्रैव संयुक्तो धात्रा गर्भे पुन: पुन:।
तत्र तत्रैव वसति न यत्र स्वयमिच्छति॥ ११॥
 
 
अनुवाद
जिस भी गर्भ में विधाता जीव को रहने के लिए बार-बार प्रेरणा देता है, वह जीव उसी गर्भ में तो रहता है; परंतु जिस स्थान पर वह रहना चाहता है, वहाँ वह नहीं रह पाता ॥11॥
 
In whichever womb the Creator repeatedly inspires the living being to live, that living being lives in that very womb; but in the place where it wishes to live, it is unable to live there. ॥ 11॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)