श्री महाभारत  »  पर्व 12: शान्ति पर्व  »  अध्याय 224: बलि और इन्द्रका संवाद, बलिके द्वारा कालकी प्रबलताका प्रतिपादन करते हुए इन्द्रको फटकारना  »  श्लोक 47
 
 
श्लोक  12.224.47 
आहु: सर्वमिदं चिन्त्यं जना: केचिन्मनीषया।
अस्या: पञ्चैव चिन्ताया: पर्येष्यामि च पञ्चधा॥ ४७॥
 
 
अनुवाद
कुछ विद्वान् पुरुष अपनी बुद्धि के आधार पर कहते हैं कि यह सब काल नामक ब्रह्म है। इसका इसी रूप में चिन्तन करना चाहिए। मास आदि उपर्युक्त पाँच विषय इसी चिन्तन के विषय हैं। मैं उपर्युक्त पाँच भेदों से काल को जानता हूँ॥ 47॥
 
Some learned men say on the basis of their intellect that all this is the Brahman known as time. It should be thought of in this form. The above mentioned five subjects like month etc. are the subjects of this thought. I know time with the above mentioned five distinctions.॥ 47॥
 
 समीक्षित और संदर्भानुकूल अनुवाद (Contextual Translation)